Thursday, 29 September 2016

ग्रामीण भारत में स्वरोजगार के अवसर एवं चुनौतियां


यह ऐतिहासिक सत्य है कि शहरीकरण की व्यापक प्रक्रिया ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति उदासीनता पैदा की है। शहर न केवल उत्पादन, वितरण और प्रबंधन के केंद्र बने हैं बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था की दिशा भी तय कर रहे हैं। संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र विगत कई दशक से महज कच्चे माल के स्रोत बन कर रह गए हैं। पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था जोकि कृषि, हस्तशिल्प, लघु-कुटीर उद्योगों पर निर्भर थी, वे औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा वैश्वीकरण के आगमन के साथ समाप्त-सी होती चली गई। भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार कृषि नवीन तकनीकों के इस्तेमाल के बावजूद संकट का सामना कर रही है। भारत की कुल श्रम शक्ति का करीब 60 प्रतिशत भाग कृषि व सहयोगी कार्यों से आजीविका प्राप्त करता है। इसके बावजूद देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान केवल 16 प्रतिशत है। निर्यात के मामले में भी इसका हिस्सा महज 10 प्रतिशत ही है। ग्रामीण रोजगार के महत्वपूर्ण व आकर्षक क्षेत्र होने के बावजूद कृषि क्षेत्र से लोगों का पलायन जारी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में पिछले दिनों बताया गया था कि करीब 40 प्रतिशत किसान अन्य रोजगार करना चाहते हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर भारी संख्या में पलायन भी ग्रामीण रोजगार की निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

परंतु खुशी की बात यह है  की आज का एक तबका ऐसा भी है जो इस चुनौती को स्वीकार किया है और अपने ग्रामीण क्षेत्र में ही कुछ कर गुजरने की चाह रखते है। 
इसी चाह ने उन्हें स्वरोजगार का अवसर प्रदान किया है और युवा स्वरोजगार अपना कर अच्छी आय अर्जित कर रहे है।

कहानी अभी यही ख़त्म नही हुई आगे अभी और भी है. . . . . . . . 

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